टीपू सुल्तान से बीजेपी को इतना ऐतराज़ क्यों है? - Benakab Bhrastachar
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टीपू सुल्तान से बीजेपी को इतना ऐतराज़ क्यों है?

संवाददाता अरमान अली बी बी लाइव न्यूज आलापुर अम्बेडकर नगर

टीपू सुल्तान से बीजेपी को इतना ऐतराज़ क्यों है?

मैसूर का शेर’ कहे जाने वाले टीपू सुल्तान की जयंती पर कर्नाटक सरकार ने एक बड़ा समारोह आयोजित करने का फ़ैसला किया है.

18वीं सदी में मैसूर के शासक रहे टीपू सुल्तान का जन्म 10 नवंबर 1750 को हुआ था.

कर्नाटक सरकार टीपू सुल्तान की जयंती पर लंबे अरसे से क्षेत्रीय कार्यक्रम आयोजित करती आई है.

वहीं टीपू सुल्तान को ‘बर्बर’, ‘सनकी हत्यारा’ और ‘बलात्कारी’ समझने वाली भारतीय जनता पार्टी इन आयोजनों का विरोध करती रही है और इस साल भी ये विरोध जारी है.
शनिवार सुबह बीजेपी की कर्नाटक इकाई ने ट्वीट किया, “कांग्रेस और टीपू सुल्तान में बहुत सारी समानताएं हैं. दोनों हिंदू विरोधी रहे हैं. दोनों अल्पसंख्यकों को संतुष्ट करना चाहते हैं. इसीलिए कांग्रेस पार्टी टीपू की जयंती पर जश्न मना रही है.”

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कर्नाटक में बीते कुछ दिनों से भाजपा और आनुषांगिग दल टीपू सुल्तान की जयंती का विरोध कर रहे हैं. इसे ध्यान में रखते हुए कर्नाटक में सुरक्षा व्यवस्था मज़बूत कर दी गई है.

टीपू की जयंती को लेकर खड़े हुए विवाद के बीच शुक्रवार शाम को कर्नाटक के मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी ने कहा कि स्वास्थ्य ठीक नहीं होने के कारण वो जयंती समारोह में हिस्सा नहीं लेंगे.

कुछ राजनीतिक जानकार मानते हैं कि आगामी चुनावों के मद्देनज़र तैयार हो रहे राजनीति ग्राउंड पर किसी भी तरह की ग़लती से बचने के लिए कुमारस्वामी ने ये फ़ैसला किया है.

लेकिन हर बार की तरह इस बार भी भाजपा टीपू सुल्तान पर अपना रुख स्पष्ट कर चुकी है.

जन्म का जश्न
बीते सालों में टीपू सुल्तान की जयंती मनाए जाने पर हिंसक विरोध प्रदर्शन हो चुके हैं.

साल 2015 में कर्नाटक के कोडागु ज़िले में टीपू सुल्तान की जयंती के विरोध में हुए प्रदर्शन के दौरान विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) के एक कार्यकर्ता की मौत हो गई थी. इसके साथ ही कई लोग घायल हुए थे.

भाजपा के विचार में कर्नाटक सरकार मुसलमानों को ख़ुश करने के लिए टीपू सुल्तान के जन्म का जश्न मनाती है.

लेकिन भाजपा और आरएसएस को टीपू सुल्तान से इतना परहेज़ क्यों है? ये समझने के लिए बीबीसी संवाददाता अनंत प्रकाश ने संघ के विचारक और राज्यसभा सांसद राकेश सिन्हा से बात की.

राकेश सिन्हा के अनुसार, “टीपू सुल्तान ने अपने शासन का प्रयोग हिंदुओं का धर्मांतरण करने के लिए किया और यही उनका मिशन था. इसके साथ ही उन्होंने हिंदुओं के मंदिरों को तोड़ा, हिंदू महिलाओं की इज़्ज़त पर प्रहार किया और ईसाइयों के चर्चों पर हमले किये. इस वजह से हम ये मानते हैं कि राज्य सरकारें टीपू सुल्तान पर सेमिनार कर सकती हैं और उनके अच्छे बुरे कामों पर चर्चा कर सकती हैं. लेकिन उनकी जयंती पर समारोह आयोजित करके कर्नाटक सरकार क्या संदेश देना चाहती है?”

टीपू सुल्तान को एक ऐसा शासक समझा जाता है जिसने अपने शासन काल में कृषि-व्यवस्था में बड़े सुधार किये.

इसपर राकेश सिन्हा ने कहा, “किसी भी शासक के सामाजिक दर्शन का मूल्यांकन उस अवसर पर होता है जब आपकी ताक़त चरम पर होती है. टीपू सुल्तान ने अपने अंतिम समय में लाचारी की स्थिति में अपने ज्योतिषी के कहने पर श्रृंगेरी मठ की मदद की. लेकिन उनका पूरा काल धर्मांतरण से भरा हुआ है.”

“किसी भी दौर के शासक के लिए ये ज़रूरी है कि वो राजधर्म का पालन करे. यदि आप शासक हैं तो आपको अपनी पूरी जनता को एक समान नज़र से देखना होगा. ऐसा नहीं करने वाला कोई भी शासक इतिहास में हाशिए पर जगह पाता है. क्या हम ऐसे शासकों को युवाओं के लिए प्रेरणा स्त्रोत बनने दे सकते हैं?”

कांग्रेस सरकार ने टीपू सुल्तान को एक हीरो के तौर पर पेश किया
टीपू एक बड़ा चुनावी मुद्दा
कर्नाटक में भाजपा के लिए टीपू सुल्तान बीते काफ़ी समय से एक अहम मुद्दा बने हुए हैं.

भाजपा की राजनीति पर नज़र रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार अखिलेश शर्मा ने बीबीसी से बात करते हुए बीजेपी द्वारा पहले कर्नाटक और टीपू सुल्तान की जयंती के विरोध में दिल्ली में हो चुके विरोध प्रदर्शनों की वजह बताई.

अखिलेश शर्मा ने कहा, “ये सिर्फ़ कर्नाटक तक ही सीमित नहीं है. दरअसल बीजेपी के लोग टीपू सुल्तान के मुद्दे को ज़िंदा रखना चाहते हैं इसलिए वो दिल्ली में भी विरोध प्रदर्शन करते हैं. इसी साल की शुरुआत में दिल्ली में भाजपा विधायक टीपू सुल्तान की तस्वीर का विरोध करते हुए उसकी जगह सिख नेताओं की तस्वीरें लगाने की बात कर रहे थे.”

भाजपा-अकाली दल के विधायक मनजिंदर सिंह सिरसा ने कहा था कि उन्होंने सुझाव दिया है कि दिल्ली विधानसभा में टीपू सुल्तान की जगह सिख नेता जस्सा सिंह अहलूवालिया की तस्वीर लगानी चाहिए.

बीजेपी बीते कई सालों से कर्नाटक में टीपू सुल्तान की जयंती मनाए जाने का विरोध कर रही है.

अखिलेश शर्मा कर्नाटक में टीपू पर हो रही राजनीति के बारे में कहते हैं, “कर्नाटक में बीजेपी इसे एक बड़ा मुद्दा बनाकर रहेगी. इसकी वजह ये है कि बीजेपी वहाँ कांग्रेस के मुख्यमंत्री को हिंदू विरोधी नेता साबित करना चाहती है. और ये भी कि उनकी नीतियाँ हिंदू विरोधी हैं.”

“हाल ही में अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ कुछ मामलों को वापस लेने की बात हुई थी तो बीजेपी ने मुद्दा बनाया था कि इन केसेज़ को वापस क्यों लिया जा रहा है. अनंत हेगड़े वहाँ पर टीपू सुल्तान को एक बड़ा मुद्दा बनाना चाहते हैं. बीजेपी को लगता है कि अगर टीपू सुल्तान की ज़्यादतियों का ज़िक्र करें, उन्हें एक खलनायक की तरह पेश करें तो कर्नाटक के तटीय क्षेत्रों में पार्टी को वोट मिल सकते हैं.”

हालांकि विपक्षी पार्टियाँ इस मामले में बीजेपी पर दोहरा रवैया अपनाने का आरोप लगाती हैं.

अखिलेश शर्मा ने बताया, “विडंबना ये है कि इस मुद्दे पर बीजेपी की राय बदलती रहती है क्योंकि एक समय में जब कर्नाटक में बीजेपी की सरकार थी तो मुख्यमंत्री जगदीश शेट्टर ने उन्हें एक नायक बताया था. राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद भी कर्नाटक विधानसभा की 60वीं सालगिरह के मौक़े पर टीपू सुल्तान की तारीफ़ कर चुके हैं. ऐसे में बीजेपी के लिए ये कोई स्थाई मुद्दा नहीं है और इस पर उनकी राय ज़रूरत के हिसाब से बदलती रहती है.”

क्या कहता है इतिहास?
मैसूर के पूर्व शासक टीपू सुल्तान को एक बहादुर और देशभक्त शासक के रूप में ही नहीं धार्मिक सहिष्णुता के दूत के रूप में भी याद किया जाता है.

लेकिन इतिहास की मानें तो टीपू सुल्तान को सांप्रदायिक शासक सिद्ध करने की कहानी गढ़ी हुई है.

कुछ समय से भाजपा नेता और दक्षिणपंथी इतिहासकार टीपू को ‘हिंदुओं के दुश्मन’ मुस्लिम सुल्तान के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहे हैं. टीपू को हिंदुओं का सफ़ाया करने वाला शासक बताया जा रहा है.

मगर टीपू से जुड़े दस्तावेज़ों की छानबीन करने वाले इतिहासकार टीसी गौड़ा वरिष्ठ पत्रकार इमरान क़ुरैशी को बताते हैं, “टीपू के सांप्रदायिक होने की कहानी गढ़ी गई है.”

टीपू ऐसे भारतीय शासक थे जिनकी मौत मैदाने-जंग में अंग्रेज़ो के ख़िलाफ़ लड़ते-लड़ते हुई थी. साल 2014 की गणतंत्र दिवस परेड में टीपू सुल्तान को एक अदम्य साहस वाला महान योद्धा बताया गया था.

राम नाम वाली टीपू सुल्तान की अंगूठी
राम नाम वाली थी टीपू सुल्तान की अंगूठी
गौड़ा कहते हैं, “इसके उलट टीपू ने श्रिंगेरी, मेल्कोटे, नांजनगुंड, सिरीरंगापटनम, कोलूर, मोकंबिका के मंदिरों को ज़ेवरात दिए और सुरक्षा मुहैया करवाई थी.”

वो कहते हैं, “ये सभी कुछ सरकारी दस्तावेज़ों में मौजूद हैं. हालांकि कोडगू पर बाद में किसी दूसरे राजा ने भी शासन किया जिसके शासनकाल के दौरान महिलाओं का बलात्कार हुआ. ये लोग इन सबके बारे में बात क्यों नहीं करते हैं?”

वहीं, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ एडवांस्ड स्टडीज़ के प्रोफ़ेसर नरेंद्र पानी टीपू पर एक अलग ही नज़रिया रखते हैं.

वरिष्ठ पत्रकार इमरान क़ुरैशी के साथ बातचीत में वह कहते हैं, “18वीं सदी में हर किसी ने लूटपाट और बलात्कार किया. साल 1791 में हुई बंगलुरू की तीसरी लड़ाई में तीन हज़ार लोग मारे गए थे. बहुत बड़े पैमाने पर बलात्कार और लूटपाट हुई. लड़ाई को लेकर ब्रितानियों ने जो कहा है उसमें उसका ज़िक्र है.”

प्रोफ़ेसर नरेंद्र पानी कहते हैं, “हमारी सोच 21वीं सदी के अनुसार ढलनी चाहिए और हमें सभी बलात्कारों की निंदा करनी चाहिए चाहे वो मराठा, ब्रितानी या फिर दूसरों के हाथों हुआ हो.’

“टीपू के सबसे बड़े दुश्मनों में से एक हैदराबाद के निज़ाम थे. इस मामले को एक सांप्रदायिक रंग देना ग़लत है. सच तो ये है कि श्रिंगेरी मठ में लूटपाट मराठों ने की थी, टीपू ने तो उसकी हिफ़ाज़त की थी.”

श्रीरंगपट्टनम में बहुत से लोग टीपू सुल्तान का मकबरा देखने आते हैं
टीपू का साम्राज्य
टीपू सुल्तान मैसूर से लगभग 15 किलोमीटर की दूरी पर श्रीरंगपट्टनम में एक सुंदर मकबरे में अपने पिता हैदर अली और माँ फ़ातिमा फ़ख़रुन्निसा के बाज़ू में दफन हैं.

श्रीरंगपट्टनम टीपू की राजधानी थी और यहां जगह-जगह टीपू के युग के महल, इमारतें और खंडहर हैं.

टीपू के मक़बरे और महलों को देखने के लिए हजारों की संख्या में लोग श्रीरंगपट्टनम जाते हैं.

टीपू के साम्राज्य में हिंदू बहुमत में थे. टीपू सुल्तान धार्मिक सहिष्णुता और आज़ाद ख़्याल के लिए जाना जाते हैं जिन्होंने श्रीरंगपट्टनम, मैसूर और अपने राज्य के कई अन्य स्थानों में कई बड़े मंदिर बनाए, और मंदिरों के लिए ज़मीन दी.

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