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महाराज’ ज्योतिरादित्य सिंधिया को कैसे पचा पाएंगे शिवराज?

महाराज' ज्योतिरादित्य सिंधिया को कैसे पचा पाएंगे शिवराज?

एमपी: ‘महाराज’ ज्योतिरादित्य सिंधिया को कैसे पचा पाएंगे शिवराज?

21 जनवरी 2019 की रात एक मुलाकात ने एमपी की सियासत में हड़कंप मचा दिया था। यह मुलाकात ज्योतिरादित्य सिंधिया Jyotiraditya Scindia और शिवराज सिंह चौहान Shivraj Singh Chouhan के बीच हुई थी। बंद कमरे के अंदर दोनों नेताओं के बीच 40 मिनट तक चर्चा हुई।

   
भोपाल
माफ करो महाराज! हमारा नेता शिवराज… मध्य प्रदेश में बीजेपी ने पिछला विधानसभा चुनाव इसी नारे के साथ लड़ा था। कांग्रेस के ‘पाप’ गिनाते हुए शिवराज की उपलब्धियों का खूब बखान किया गया था। प्रदेश में भले ही कांग्रेस ने सरकार बना ली पर पार्टी में ज्योतिरादित्य और बीजेपी में शिवराज दोनों ही नेता नेपथ्य में चले गए। आज हालात पूरी तरह बदल गए हैं और उन्हीं ‘महाराज’ ने हाथ में कमल थाम लिया है। ऐसे में राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा है कि क्या पार्टी में ‘महाराज’ की एंट्री को शिवराज आसानी से पचा पाएंगे?

सिंधिया की बीजेपी में एंट्री से शिवराज सिंह चौहान पर क्या असर पड़ेगा और हाथ का साथ छोड़ चुके सिंधिया और शिवराज के बीच क्या केमिस्ट्री बनेगी, यह समझना दिलचस्प है। ऐसा कहा जाता है कि सियासत में कुछ भी स्थायी नहीं होता है। शायद यही वजह है कि सिंधिया के कांग्रेस छोड़ने पर जब उन्हें ‘माफिया’ और ‘गद्दार’ कहा जाने लगा तो शिवराज सिंह चौहान ने आगे आकर उनका बचाव किया।

उन्होंने कहा, ‘जब तक वहां थे तब तक महाराजा थे और आज माफिया हो गए? ये दोहरे मापदंड कांग्रेस को शोभा नहीं देते।’ सिंधिया को लेकर बीजेपी नेता और एमपी के तीन बार के सीएम शिवराज सिंह चौहान की इस प्रतिक्रिया काफी कुछ बातें स्पष्ट कर दीं। दरअसल, बीजेपी के पास सिंधिया की बगावत को भुनाने का बेहतरीन मौका आया था तो शिवराज ने भी कांग्रेस पर चुटकी लेने में देर नहीं लगाई।

आज जब सिंधिया ने बीजेपी का दामन थामा तो शिवराज ने एक लाइन में बड़ा स्पष्ट संदेश दिया। उन्होंने लिखा, ‘स्वागत है महाराज, साथ है शिवराज’।

तब बंद कमरे में मिले थे सिंधिया-शिवराज
इससे पहले 21 जनवरी 2019 की रात की वो घटना याद कीजिए जब एक मुलाकात ने एमपी की सियासत में हड़कंप मचा दिया था। यह मुलाकात ज्योतिरादित्य सिंधिया और शिवराज सिंह चौहान के बीच हुई थी। बंद कमरे के अंदर दोनों नेताओं के बीच 40 मिनट तक चर्चा हुई। यही नहीं, दोनों साथ-साथ बाहर निकले और कहा कि बातचीत अच्छी रही। शिवराज और ज्योतिरादित्य ने इसे शिष्टाचार भेंट बताया। हालांकि दो दिग्गज राजनेता जब बंद कमरे के अंदर बात करें तो शायद ही कोई माने कि सियासी चर्चा नहीं हुई होगी।

शिवराज का सिंधिया राजघराने पर हमला
इस मुलाकात को 13 महीने बीत चुके हैं। शिवराज और ज्योतिरादित्य एमपी की सियासत के दो बड़े चेहरे हैं। अतीत पर को याद करें तो मार्च 2017 में एक चुनावी रैली के दौरान तत्कालीन सीएम शिवराज सिंह चौहान ने सिंधिया राजघराने पर हमला बोला था। भिंड के अटेर में चुनावी सभा करते हुए उन्होंने अंग्रेजों से मिले होने और लोगों पर जुल्म ढाने की बात कही। शिवराज ने कहा था, ‘1857 के स्वतंत्रता संग्राम में असफल होने के बाद अंग्रेजों और अंग्रेजों के साथ-साथ सिंधिया ने बड़े जुल्म ढाए थे।’

चुनाव में ‘माफ करो महाराज’ स्लोगन चर्चित
सियासी तौर पर सिंधिया परिवार का एमपी में अच्छा-खासा असर है। जुल्म वाले बयान के बाद शिवराज का उन्हीं की पार्टी की नेता और सिंधिया राजघराने से आने वालीं यशोधरा राजे ने खुलकर विरोध किया था। 2018 में जब एमपी में विधानसभा चुनाव हुए तो माफ करो ‘महाराज’, हमारा नेता शिवराज स्लोगन काफी चर्चा में रहा। कैंपेन के सहारे बीजेपी ने सीधे सिंधिया पर हमला बोला।

वहीं, सिंधिया ने भी चुनावी रैलियों में मंदसौर फायरिंग का जिक्र करते हुए कहा कि शिवराज सरकार के हाथ किसानों के खून से रंगे हैं। पूरा चुनाव सिंधिया और शिवराज के इर्द-गिर्द लड़ा गया। लेकिन नतीजों के बाद दोनों नेता सूबे की सियासत में नेपथ्य पर थे। जहां एक ओर शिवराज को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष का ओहदा मिल गया वहीं सिंधिया को वेस्ट यूपी प्रभारी बना दिया गया।

दोनों के लिए जरूरी और मजबूरी!
एमपी के वर्तमान सियासी हालात में कहीं न कहीं अब दोनों नेता एक-दूसरे के लिए जरूरी भी हैं और सियासी मजबूरी भी। इस बात को यूं समझ सकते हैं कि बीजेपी से राज्यसभा टिकट मिलने के साथ ज्योतिरादित्य की केंद्रीय राजनीति में भूमिका का रास्ता साफ हो जाएगा। दूसरी ओर उनके समर्थक विधायक चौथी बार शिवराज की ताजपोशी में मदद कर सकते हैं। शिवराज को बीजेपी के अंदर कैलाश विजयवर्गीय, प्रह्लाद पटेल और नरेंद्र तोमर जैसे नेताओं से चुनौती मिलती रही है। ऐसे में सिंधिया के साथ जुगलबंदी करके वह अपनी स्थिति और मजबूत कर सकते हैं।

भले ही सिंधिया का असर चंबल क्षेत्र (ग्वालियर, भिंड, मुरैना और शिवपुरी) तक सीमित माना जाता हो लेकिन प्रदेश में उनकी लोकप्रियता कम नहीं है। शिवराज और सिंधिया के रिश्ते भले ही चुनावी मंच पर असहज दिखते रहे हों लेकिन कहा जाता है कि एमपी क्रिकेट असोसिएशन की पॉलिटिक्स में उन्होंने सिंधिया के लिए मुश्किल नहीं खड़ी की। पिछले साल एमपी क्रिकेट संघ के चुनाव में सिंधिया गुट ने कैलाश विजयवर्गीय के गुट को करारी शिकस्त दी थी।

जननेता सिंधियाजी को नमन!
एमपी में सियासी उठापटक के बीच माधव राव सिंधिया के जन्मदिवस पर शिवराज ने ट्वीट किया, ‘मध्य प्रदेश के लोकप्रिय जननेता स्वर्गीय माधवराव सिंधिया जी के जन्मदिवस पर नमन!’ इस ट्वीट के इशारे को समझना कठिन नहीं है। चुनाव के दौरान जुबानी जंग बीते दौर की बात है और अब उसे दिल से भुलाकर नए मोड़ पर सिंधिया के हमसफर बनने को शिवराज तैयार नजर आते हैं।

उधर, कांग्रेस और सिंधिया के रिश्तों को लेकर इस वक्त मशहूर शायर बशीर बद्र की वो नज्म याद आती है- अभी राह में कई मोड़ हैं, कोई आएगा कोई जाएगा… तुम्हें जिसने दिल से भुला दिया, उसे भूलने की दुआ करो। शायद इसी राह पर चलते हुए अब कांग्रेस और ज्योतिरादित्य सिंधिया एक-दूसरे को भुलाने की कोशिश करेंगे। सियासत की राह में सिंधिया ने बीजेपी के रूप में नई मंजिल चुन ली है।

बेनकाब भ्रष्टाचार

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