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गेहॅू की फसल में पीली गेरूई व करनाल बण्ट बीमारी के लिए सावधान रहें कृषक

गेहॅू की फसल में पीली गेरूई व करनाल बण्ट बीमारी के लिए सावधान रहें कृषक

गेहॅू की फसल में पीली गेरूई व करनाल बण्ट बीमारी के लिए सावधान रहें कृषक
बहराइच 12 फरवरी। जिला कृषि रक्षा अधिकारी आर.डी. वर्मा ने बताया कि भारत सरकार के अधीन कृषि मंत्रालय द्वारा जारी विज्ञप्ति के अनुसार उत्तर प्रदेश के तराई वाले 17 जनपद जिनमें बहराइच भी सम्मिलित है, गेहूॅ की फसल में पीली गेरूई व करनाल बण्ट बिमारी के लिए अत्यन्त संवेदनशील है। वर्तमान में चूंकि माह फरवरी का दूसरा सप्ताह चल रहा है ऐसे समय में पर्यावरण में नमी व सूर्य का प्रकाश धीरे-धीरे बढ़ने के कारण नमी व ताप में आने वाले उतार-चढ़ाव के कारण गेहूॅ की फसल में पीली गेरूई व करनाल बण्ट बिमारी के लगने की संभावना बढ़ जाती है।
पीली गेरूई रोग के लक्षणों के बारे में श्री वर्मा ने बताया कि माह जनवरी के अन्त या फरवरी के प्रथम सप्ताह में गेंहूॅ की पत्तियों पर पीला रंग का पाउडर दिखाई देने लगता है। पीली गेरूई रोग की रोकथाम के लिए जिला कृषि रक्षा अधिकारी द्वारा कृषकों को सुझाव दिया गया है कि क्षेत्र में अनुमोदित प्रजातियाॅ ही उगायें तथा दूसरे क्षेत्रों के लिए अनुमोदित प्रजाति न उगायें। मुख्य उन्नत प्रजातियों के सम्बन्ध में श्री वर्मा ने बताया कि समय से (माह नवम्बर) में बुवाई करने के लिए डीबीडब्ल्यू 88, एचडी 3086, डब्ल्यूएच 1124, एचडी 2967, डीबीडब्ल्यू 621, डब्ल्यूएच 542 व पीडीडब्ल्यू 314 श्रेष्ठ हैं। जबकि देर से बुवाई करने पर डीबीडब्ल्यू 90, डब्ल्यूएच 1124 डीबीडब्ल्यू 71, एचडी 3059, पीबीडब्लू 590 व डीबीडब्ल्यू 16 बेहतर हैं।
पीली गेरूई रोग के नियंत्रण के बारे में जिला कृषि रक्षा अधिकारी ने कृषकों को सुझाव दिया है कि अनुमोदित प्रजातियों की बुवाई समय से करें, खेतों का निरीक्षण शुरू से ही बडे ध्यान से करें, विशेषकर वृक्षो के आस-पास या पापलर वृक्षो के बीच उगाई गई फसल पर अधिक ध्यान दें, गेहॅू की पत्तियों पर पीला गेरूई का लक्षण दिखने पर कृषि विभाग के कर्मचारी से तत्काल संपर्क करें।
जिला कृषि रक्षा अधिकारी ने कृषकों को यह भी सुझाव दिया है कि गेहॅू की फसल में पीली गेरूई रोग के लक्षण दिखाई देते ही सही दवा का उचित मात्रा में छिड़काव करें यह स्थिति प्रायः माह जनवरी के अंत या माह फरवरी के प्रारम्भ में आती है। श्री वर्मा ने बताया कि रोग के लक्षण दिखाई देने पर प्रोपिकोनाजोल 25 प्रति. ई.सी. या टेबुकोनाजोल 25 प्रति ई.सी. या ट्राईडिमीफोन 25 प्रति. डब्लू.पी. का घोल बनाकर 500 मि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर की दर से 600 से 800 ली. पानी में मिलाकर छिड़काव करें तथा 15 दिन के अंतराल पर छिड़काव करें।
श्री वर्मा ने बताया कि करनाल बण्ट बीमारी कवक के द्वारा गेहॅू की बाली में खेत में खड़ी फसल में दाने बनने के बाद लगती है। जिसमें हर बाली के कुछ दाने का आधार काला हो जाता है तथा अनाज काले पाउडर जैसे गुच्छों से भरे हुए होते है। जब दोनों को कुचला जाता है तो सड़ी हुई मछली जैसी बदबू आती है। इस रोग के निदान के लिए प्रोपिकोनाजोल 25 प्रति. ई.सी. या हैक्साकोनोजोल 25 प्रति. ई.सी. या टेबुकोनाजोले 25 प्रति. ई.सी. को 500 मिली. प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़़काव करना चाहिए। उन्होंने यह भी बताया कि फसलों में लगने वाले किसी बीमारी या कीटों से सम्बन्धित किसी भी समस्या के लिए जिला कृषि रक्षा अधिकारी बहराइच के मो. 9839206867 पर सम्पर्क किया जा सकता है

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